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Friday, September 28, 2012

ज़लजला(एक भीषण परिवर्तन) ((क)वन्दना(४) राष्ट्र-वन्दना ! मेरे भारत देश ! (ब)



  ! मेरे भारत देश !


   
       (ब)


मेरे भारत देश,’पिता’ का,तुमने सब को ‘प्यार’ दिया है |
‘माता’ बनकर,’ममता’ बाँटी,कितना मधुर दुलार दिया है ||
खाकर ‘अन्न’,’दूध सा जल’पी,’साँसों’ में भर ‘महक हवा की’-
भूल गये अहसान तम्हारा,’पूतों में है ‘लाज’ न बाकी ||१||


तुमसे बढ़ कर,’अपनी सत्ता,कुर्सी औ पद,मान को समझा |
‘स्वार्थ-वित्त,कंचन,चाँदी’ से,कम ‘निष्ठा-ईमान’ को समझा ||
‘फैशन’औ ‘सुखवाद’ को ईश्वर से बढ़ कर सब ने पहंचाना | 
आपस के सम्बन्धों को तज,’भौतिक सुख’ को ऊपर माना ||२||


 ‘तड़क भड़क’ औ चटक मटक’ ही बने ‘सभ्यता के पैमाने’ |
‘यौन-पिपासा’,’काम-वासना’ अपने पाँव लगे फैलाने ||
‘मृग-तृष्णा’ में डूबे सारे ‘पुत्र तुम्हारे’ हो दीवाने ||
तुम्हीं बताओ ‘देश हमारे’,आये ‘कौन’ इन्हें समझाने !!३||


‘बहुमंजिली इमारत वाले,हैं अपने को ‘ईश्वर’ कहते |
‘पूँजी के इन पुजारियों’ के ‘अत्याचार’,’झोंपड़े’ सहते ||
‘धन की प्यास’ बढ़ाई इतनी,’बेच रहे’,’अपने पूतों’ को |
धिक्कारो ‘दहेज के भूखे’,पामर इन ‘विनाश-दूतों को !!४!!


  

‘हलचल’ मची हुयी, ‘शान्ति के घर के सब स्तम्भ’ हिले हैं |
‘लालच के इन तूफ़ानों’ में, हम को केवल ‘दर्द’ मिले हैं ||
‘लोभ भरी तृष्णा’ तुम को’ ‘जंजीरों’ में ‘जकड लिया’ है |
नागरिकों ने पुन: ‘दासता के कुपन्थ’ को ‘पकड़ लिया’ है ||५||


कुछ ‘पूँजी के दास' कई हैं, ‘गुलाम तन की सुन्दरता के’ |
‘पिंजड़े’ में हैं ‘बन्द’, ‘संकुचित’ ‘ह्रदय’ हुये हैं ‘इस जनता’ के ||
राष्ट्र-देव,’गुरु’ अखिल जगत के,तुम ऐसी कुछ ‘युक्ति’ चलाओ |
‘ईश्वर’ या ‘अवतार-पयम्बर’ इस धरती पर पुन: बुलाओ ||६||


‘राम-कृष्ण’ या ‘बुद्ध’, ‘मुहम्मद’, ‘ईसा’, ‘नानक’ आदि पुकारो !
‘कबीर’,’ग़ालिब’,’गान्धी’बन् कर,अपना बिगड़ा रूप सुधारो !!   
‘त्याग भोग से बड़ा’ पाठ यह, सब को फिर से आज पढाओ !
केवल भौतिक नहीं, ‘आत्मिक,प्रगति-शिखर’ पर हमें चढ़ाओ !!७||


‘प्रेम-नीर’,’सन्तोष-उर्बरक’ से “प्रसून” कुछ सुभग खिलाओ !
तज कर घृणा,बैर ‘हर मानव’ से ‘मानव’का ह्रदय मिलाओ !!
तब कहलाओ ‘गरिमा वाले देश’ धारा पर सब से आगे |
‘युग-सुधार’ हो,और ‘कलुषता’ देश छोड़ कर ‘बाहर भागे’ ||८||
         
 
        
 
     

Tuesday, September 25, 2012

ज़लजला(एक भीषण परिवर्तन) ((क)वन्दना (२) मातृ-वन्दना(सरस्वती-वन्दना) - माँ तू मुझे भी तार दे !


  
  (सरस्वती-वन्दना)

   

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    माँ तू मुझे भी तार दे !

 
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

   

जग तारिणी ! भव-तारिणी !!
माँ,तू मुझे भी तार दे !!

   

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सागर गहन,लहरें विकट | भय मृत्यु का कितना विकट !!
जो हों डूबते | तट ढूँढते ||
उनकू तू मातु उतार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!१!!
             
              

           

अज्ञान का यहाँ क्लेश है | कितना निठुर परिवेश है ||
जग क्लिष्ट है | तम श्लिष्ट है ||
इसमें तूज्योती उतार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!२!!

       

धूमिल यहाँ हर भाव है | सब से सभी को दुराव है ||
मेरा मन मलिन | पंकिल पुलिन ||      ( पुलिन =तालाब का किनारा )
तू हर कलुष को निखार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!३!!
    

सोया हुआ विशवास है | पापों भरी हर साँस है ||
हर दोष हर ! परितोष भर !!
बिगड़ी मेरी सुधार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!४!!

 

दूषण सने ‘भव-गीत’ हैं | छलना भरे ‘संगीत’ हैं ||
सत्-सुर सजे | वीणा बजे ||
ऐसी ‘मधुर ‘झंकार’ दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!५!!



‘अघ’,’औघ’ से जग सुप्त है | ‘जागृति’ यहाँ से लुप्त है ||
‘परितोष’ कर ! ‘उद्बोध’ भर !!
कर दूर तू ‘कुविकार’ दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!६!!

 


Monday, September 24, 2012

जलजला (क) वन्दना (१) ईश-वन्दना हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!

(सारे चित्र गूगल से साभार )


  
ईश-वन्दना 
  
                          
    हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!

                        
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  ' स्वतंत्रता ' का धीरज टूटा |
  हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!


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'कलि'ने अपना 'बिगुल' बजाया |
'पुण्य-दलन अभियान ' चलाया ||




चली 'वासना' अपनी बाहें, 
'तृष्णा' की बाहों में डाले |
तुम्हें छोड़ कर कौन जगत में, 
जो इन सब से सृष्टि बचा ले !! 
       
'राजनीति'बन ठन कर निकली |
'खेल' खेल कर स्वाँग सा झूठा-
ठठ्ठा मार रही है जी भर | 
हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!१!!




हैं 'विनाश' ने नयना खोले | 
'धर्म-रत्न 'सब छिपे टटोले ||

लगता इन्हें लूटने आया,
'दुराग्रह' को साथ में लाकर |
'मानवता की रत्न-पिटारी',
 पटकी,खोली, और हिलाकर ||

चुरा लिए हैं  'शील के मोती '|
किया है अपहृत 'प्रेम अनूठा '|
'विश्वासों की माला' ली हर |
हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!२!!

 नाच रही है अट्टहास कर |
 चहुँ तरफा मैली कुवास भर ||

धसक धसक कर धरा डोलती,
लगता कोइ ज़लज़ला आया |
'सज्जनता' को पीड़ा पहुँची,
नयनों नीर छलकता आया ||

'हिंसा','छलना',सहेलियाँ दो,
'मर्यादा' को दिखा अंगूठा |
निकली हैं, लगता मद पी कर |
हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!३!!



चला  'स्वेच्छाचार'  रौंदने |
'मानवता'  की जड़ें खोदने ||

'करुणा ',' दया 'औ 'ममता ' भागीं,
छुपने अपनी 'लाज 'बचाने |
संयम,नियम के बन्धन तोड़े,
'मनमानी ' का नाच नचाने ||

ज्यों हिंसक मरखने बैल ने, 
तोड़ दिया हो अपना खूटा |   
कुचल रहा हो,सबको जी भर |
हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!४!!




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